एक ज़माने में, ईसा-पूर्व तीसरी–चौथी शताब्दी के दौर में आज की तरह मछली को कम तापमान पर बनाए रखते हुए अंदरूनी इलाक़ों तक पहुँचाने के साधन नहीं थे। इसी वजह से मछली को नमक और चावल के साथ संसाधित (अचार जैसी हालत में) करके किण्वित (फ़र्मेंट) किया जाता था, और उसे ज़्यादा समय तक टिकाने की तकनीक विकसित हुई। यही आज की सुशी का उद्गम कहा जाता है, और आम तौर पर इसे “नारे-ज़ुशी” कहते हैं।
नारे-ज़ुशी ने भी तरह-तरह से विकास किया, पर आधुनिक दौर में आम बन चुकी निगिरी-सुशी (हाथ से दबाकर बनाई जाने वाली) शैली का जन्म १८०० के दशक की शुरुआत में, एदो काल में हुआ। शुरुआत में निगिरी-सुशी ठेलों (यातई) वग़ैरह पर बनाई जाती थी, और एदो के आम लोगों के बीच नाश्ते (ओयात्सु) जैसे अंदाज़ में चहेती थी, ऐसा लगता है।
उसके बाद, जब लगभग १९०० के आस-पास प्रशीतन (रेफ़्रिजरेशन) तकनीक विकसित हुई, तब सिरके या सोया सॉस में संसाधित न की हुई, कच्ची हालत वाली निगिरी-सुशी चलन में आने लगी। यहीं वह रूप बनता है जिसे आधुनिक दौर में खाया जाता है।
वैसे, एक मान्यता है कि जापान के विभिन्न इलाक़ों में एदोमाए की निगिरी-सुशी १९२३ के कांतो महाभूकंप के दौरान फैली, क्योंकि तोक्यो के एदोमाए सुशी कारीगर देश के तमाम इलाक़ों में जाकर बस गए।